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एक चेहरा जो मुस्कुराता था, अब अजनबी हो गया,
मैं रुका रहा देर तक, फिर ज़मीन हो गया,
खुद उसके ही हाथों, मेरा कत्ल होता रहा,
खुद अपने ही नाम में खुदकुशी हो गया,
आज फिर तेरी याद में, निगाहें झुकी रहीं,
आज फिर मेरा खुदा कुछ, कम-असर हो गया।
कई बार रातों में जगा, कि नींद खत्म हो गई,
कई बार मैं समझा कि शायद, सवेरा हो गया,
कई बार उन्हें करवटों में ढूँढता रहा,
और फिर वहीं सिलवटों का सिरा हो गया,
निगाहें ढूँढती रहीं, आसमान पिघलते रहे,
फिर आसमान ही निगाहों का बसेरा हो गया,
मुद्दतें जूझते रहे इन गमों से हम,
फिर यही गम मेरे दिल का आसरा हो गया,
मेरे ज़ेहन में तेरा कोई तराश-गार बैठा है,
काश लिया तो कुछ ना था, छोड़ा तो अक्स हो गया,
आज फिर तेरी याद में, निगाहें झुकी रहीं,
आज फिर मेरा खुदा कुछ, कम-असर हो गया।
आज फिर मेरा खुदा कुछ, कम-असर हो गया।
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