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मिट्टी की मूरत है, मिट्टी में मिल जाएगी ये शान ओ शौकत तेरी, एक दिन ढल जाएगी सांसों की माला का क्या भरोसा मेरे यार कब छूट जाए डोरी, कब रुक जाए ये तार मत कर इतना पैसे का गुरूर एक दिन उरूज ज़वाल में बदलना है आज छू ले आसमान को कल तुझे ज़मीन में ही जाना है तू अमीरी और ग़रीबी का फ़र्क़ दिखाता है रोज़-ए-महशर ये फ़र्क़ तुझे अल्लाह ने बताना है मत कर इतना पैसे का गुरूर एक दिन उरूज ज़वाल में बदलना है आज छू ले आसमान को कल तुझे ज़मीन में ही जाना है सिकंदर सा वो बादशाह भी खाली हाथ ही गया महलों का वो सारा साज़ो-सामान यहीं रह गया (ये दौलत क्या है? ये शोहरत क्या है?) सच तो सिर्फ ये है के तुझे वापस है जाना! मत कर इतना पैसे का गुरूर एक दिन उरूज ज़वाल में बदलना है आज छू ले आसमान को कल तुझे ज़मीन में ही जाना है (गुरूर न कर...) ज़मीन में ही जाना है...
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